Friday, March 20, 2015

अच्छे दिन अमीरों के .… महंगे दिन गरीबों के …

आज भारतीय संसद का ये वीडियो देख कर रुका नहीं गया मुझसे और मन हुआ कि प्रधान मंत्री जी से सीधे अपने मन की बात की जाए। मोदी जी अपने मन की बात तो अक्सर रेडियो पर कहते और करते रहते हैं।  चुनाव से पहले मंच से कुछ और चुनाव के बाद राष्ट्रीय रेडियो पर कुछ और… अब तो सुनने की आदत सी पड़ गयी है। 

चुनाव से पहले के "अच्छे दिन आने वाले हैं" हज़ारों करोड़ों रुपये वाले तरह-तरह के विज्ञापन तो आप सब को आज भी याद होंगे। न्यूज़ चेंनलों के अच्छे क्या, बहुत अच्छे दिन थे, वे दिन ! काश, वोह हज़ारों करोड़ इस देश के गरीबों पर खर्च किये जाते तो न जाने कितने गरीब गावों और भारतियों के अच्छे दिन आ जाते।  लेकिन उनकी चिंता किसे है यहाँ ? चिंता केवल वोट की होती है वोटर की नहीं, बस वोट मिलना चाहिए कैसे भी। 

मुझे याद है कि प्रधान मंत्री जी ने आम चुनाव जीतने के क्षण भर बाद ही हज़ारों की भीड़ को सम्बोधित करते हुए (अहंकार पूर्ण ) गर्वित होकर गुजरात में जाकर माइक पर गर्मजोशी में कह दिया था कि… 

प्रधान मंत्री : अच्छे दिन …… 

और भोली भाली जनता ने उनकी बातों, उनके वादों और विज्ञापनों पर भरोसा कर झटके में जवाब भी दे दिया था कि 

जनता :       आ गए !
video


अच्छे दिन कब आने वाले हैं  जी ????????????????????????????????????????
कब भई कब ??????
कोई बताने की कृपा करेगा ?????????? 
या वह भी एक जुमला ही था ???? 
काले धन के जुमले की तरह ????  

क्या २०१४ का चुनाव जनता को बेवकूफ़ समझ कर राजनैतिक चतुराई के साथ जुमलों के जाल की शह पर जीता गया था ???  अभी तक तो वही लग और दिख रहा है, शेष आने वाला कल ही बताएगा। 

लगता है बीजेपी के राज में अमीरों की चांदी और गरीबों की बर्बादी का समय आ चुका है। गरीब और मध्यम वर्गीय इंसान आज भी उम्मीद लगाए और मुंह बाये खड़ा है की शायद अच्छे दिनों का ज़्यादा समय के लिए न सही, हल्का सा कुछ समय के लिये ही मुंह दिख जाए। 

अक्सर न्यूज़ चैनलों पर बार-बार कहा गया है कि अब महंगाई जमीन पर है.. अरे भैया कोई तो बताये हमें कि  वोह किस देश की ज़मीन है ? कहाँ महंगाई औंधें मुंह पड़ी है ??  फिर चतुराई से कहा गया कि खुदरा बाजार में नहीं महंगाई का स्तर थोक बाजार में गिरा है।  थोक व्यापार तो अमीर व्यापारियों के हाथ में है। बेचारे गरीबों के हाथ में भी कुछ आएगा या वोह हमेशा की तरह खाली रहेगा।
नये भूमि अधिग्रहण अध्यादेश की तस्वीर 
अब तो पूरा किसान वर्ग भी अपने अधिकारों और परिवारों की रक्षा करने मजबूरन सड़क पर उतर आया। उनकी रोजीरोटी और अधिकारों के बचाव में अन्ना हज़ारे भी आंदोलन करने के लिए तैयार हो गए। यहाँ तक कि अब तो समूचा विपक्ष किसानों के साथ मिलकर बीजेपी के विरुद्ध मोर्चा जगह-जगह खोल चुका है। शिव सेना जो महाराष्ट्र सरकार में बीजेपी के साथ सहयोगी पार्टी है वो भी इस क़ानून के ख़िलाफ़ गरीब किसानों के हक़ में बोल रही हैं। बीजेपी पूरी तरह  इस मुद्दे पर अलग-थलग पड़ चुकी है।
भूमि अधिग्रहण अध्यादेश के खिलाफ पद यात्रा 
अब तक तो पूरा देश जान चुका है कि ज़मीन अधिग्रहण क़ानून भी किसानों से साथ बहुत बड़ा धोखा और अमीरों के साथ चोखा (दोस्ती) की तर्ज पर बनाया गया है। उनकी ज़मीन अधिग्रहित होने के बाद कभी उन्हें उचित मुवावजा नहीं मिला। बरसों अदालतों के चक्कर खाने पडतें हैं उन्हें अपनी फरियाद लेकर। बड़े शर्म का विषय है कि किसान वर्ग जो पूरे देश का पेट भरने के लिए महीनों धूप में कड़ी मेहनत करता है  वह आज़ादी के ६६ सालों के बाद भी गरीबी और बेबसी का बोझ ढोने पर मजबूर है।
LOOK AT THIS FRIGHTENING STATISTICS WHAT THIS COUNTRY HAS OFFERED TO THIS FARMING COMMUNITY THAT FEEDS THIS NATION EVERY DAY!
किसानों को उनकी फ़सल की उचित कीमत देने की बजाये (जिसका उन्हें हर चुनाव से पहले बार-बार हर बार सभी पार्टीयों से वादा मिलता रहा है) बीजेपी की नज़र अब उनकी ज़मीनों पर है।  क्या किसान वर्ग को न्याय मिला आज तक इस देश में ? अरे उन्हें उनकी फसलों के लिए पानी तक नहीं मिलता समय पर न्याय तो बहुत दूर की बात है। 1984 से लेकर आज तक महाराष्ट्र सरकार को सिंचाई के प्रोजेक्ट्स के बहाने हज़ारों करोड़ केंद्रीय सरकार से मिले मगर वो किस-किस राजनैतिक पार्टियों के कितने शक्तिशाली लोगों की जेबों  और बैंक एकाउंट्स में गए है पूरा देश जानता है।


क्या इस देश में उन्नति और विकास का तांडव बिना रुके ऐसे ही चलता रहेगा जैसे दशकों से चलता आया है ? क्या गरीबों की खुशियों को जड़ से मिटा कर ही विकास की नीवं रखी जा सकती है इस देश में। कब आएगा वह समय कब, जब इस देश के गरीब किसानों को भी इस धरती पर उचित न्याय मिलेगा ?
क्या वोट शक्ति बीजेपी को  देकर किसानों नेअपने ही हाथ कटवा लिए ???
अगर इतिहास में झांके तो जानकर बेहद दुःख होगा कि असल में इस देश में हज़ारों किसानों की ज़मीन पर विकास अमूमन चंद राजनैतिक परिवारों और उनसे अटूट सम्बन्ध रखने वाले रोबर्ट वाड्रा जैसे शक्तिशाली लोगों या फिर यादव सिंह, इंजीनियर-इन-चीफ जैसे ऊँचे ओहदे पर नियुक्त बड़े अफसर या बड़े बड़े उद्योगपती घरानों या पूंजीपतियों का ही हुआ है। हज़ारों परिवारों की ज़मीन पर चंद लोंगो का विकास कितना तर्क संगत है ये तो आने वाला समय ही बताएगा।

इस बीजेपी के नए ज़मीन अधिग्रहण कानून के गहरे विवाद पर अरविन्द केजरीवाल का बीजेपी को प्रॉपर्टी डीलर की संज्ञा देकर सुशोभित करना यहाँ सच में पूर्ण रूप से सार्थक लगता है।  कहीं ये ज़मीन अधिग्रहण कानून का बोझ बीजेपी की नैया न ले डूबे! सवाल एक नहीं कई हैं जवाब कौन देगा ?

महंगाई कब नीचे आएगी ?
काला धन कब आएगा ?
काला धन विदेशों में रखने वालों के नाम कब जनता के सामने आएंगे ?
चुनावी वादे कब पूरे होंगे ? 
अच्छे दिन कब आएंगे ?

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